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Ancient wisdom, verse by verse.

Chandogya Upanishad 4.58

इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥

4.14.3 — idamiti ha pratijajne lokanvava kila somya te'vochannaham tu te tadvakshyami yatha pushkarapalasha aapo na shlishyanta evamevamvidi papam karma na shlishyata iti bravitu me bhagavaniti tasmai hovacha || 3 ||

He answered: 'This' (repeating some of what they had told him).

'यही' — ऐसा उसने कहकर (पूर्व-उक्त अग्नि-विद्या सुना दी)। (आचार्य ने कहा —) 'हे सौम्य, वे तो तुझे लोकों के विषय में ही बता गए; अब मैं तुझे वह बताऊँगा जिसके कारण — जैसे कमल-पत्र पर जल नहीं चिपकता वैसे ही — ऐसे ज्ञानी से पाप-कर्म नहीं चिपकता।' 'भगवन्, कहिए' — तब उसने उससे कहा —