Chandogya Upanishad 5.18
तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येनच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥
5.2.3 — taddhaitatsatyakamo jabalo goshrutaye vaiyaghrapadyayoktvovacha yadyapyenachchhushkaya sthanave bruyajjayerannevasminchhakhah praroheyuh palashaniti || 3 ||
यह उपदेश सत्यकाम जाबाल ने गोश्रुति वैयाघ्रपद्य से कहकर यह भी जोड़ा — 'यदि यह उपदेश सूखे ठूँठ से भी कहा जाए, तो उसमें शाखाएँ फूटेंगी और पत्ते निकल आएँगे।'