Chandogya Upanishad 6.4
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥
6.1.4 — yatha somyaikena mritpindena sarvam mrinmayam vijnatan syadvacharambhanam vikaro namadheyam mrittiketyeva satyam || 4 ||
'What is that instruction, Sir?' he asked.
'जैसे हे सौम्य, मिट्टी के एक पिंड से ही समस्त मृण्मय (मिट्टी से बनी) वस्तुएँ जान ली जाती हैं — विकार तो केवल वाणी का आरम्भ है, नाममात्र है; सत्य तो यही है कि सब मिट्टी ही है।'