Prashna Upanishad 4.2
तस्मै स होवाच | यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तमयतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥
tasmai sa hovacha | yatha gargya marichayo'rkasyastamayatah sarva etasmims tejomandala ekibhavanti tah punah punar udayatah pracharanty evam ha vai tat sarvam pare deve manasy ekibhavati tena tarhy esha purusho na shrinoti na pashyati na jighrati na rasayate na sprishate nabhivadate nadatte nanandayate na visrijate neyayate svapitity achakshate ||
To him he said: O Gargya, just as the rays of the setting sun all become one in that luminous orb, and go forth again when it rises, so all the senses become one in the higher deity, the mind. Therefore at that time a person hears not, sees not, smells not, tastes not, touches not, speaks not, grasps not, enjoys not, excretes not, moves not. They say: He sleeps.
उनसे उन्होंने कहा — हे गार्ग्य! जैसे अस्त होते सूर्य की सभी किरणें उसी तेज-मण्डल में एकीभूत हो जाती हैं, और पुनः उदय होते ही सर्वत्र फैल जाती हैं — वैसे ही यह सब मन रूपी पर-देव में एकीभूत हो जाता है। इसीलिये उस समय यह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनन्द लेता है, न त्याग करता है, न चलता है — लोग कहते हैं 'वह सो रहा है'।